27 अप्रैल, 2009 को आनंद कुमार अपने घर लौट रहे थे. समय था रात के साढ़े नौ बजे. पास में ही तमिलनाडु इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड के कर्मचारी एक बिजली का खम्भा हटाने में लगे हुए थे. वेल्डिंग चालू थी. जैसे आनंद उसके नीचे से गुजरे, वो खंभा उनके ऊपर गिरा. सिर, कंधों और रीढ़ की हड्डी पर चोट लगी. वो वहीं चोट खाकर गिर पड़े.

उसके बाद से ही आनंद कुमार व्हीलचेयर पर रहने को मजबूर हो गए. मामला दर्ज हुआ. चेन्नई कारपोरेशन और तमिलनाडु इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड पर. कि उनकी गलती की वजह से आनंद कुमार की ये हालत हुई. सुनवाई शुरू हुई. सिंगल जज की बेंच ने पांच लाख रुपए का मुआवजा देने की बात कही. चेन्नई कारपोरेशन ने इसके खिलाफ अपील की. मद्रास हाई कोर्ट में जस्टिस एन किरुबाकरण, और जस्टिस पीवी वेलमुरुगन ने मामले में फैसला सुनाते हुए मुआवजे की रकम 63 लाख कर दी.

कोर्ट ने क्या कहा?

इस हादसे में जान तो बच गई, लेकिन आनंद कुमार पैराप्लेजिक हो गए. यानी कमर से नीचे का हिस्सा उनका लकवाग्रस्त हो गया. जजों ने कहा कि इस हादसे की वजह से ना सिर्फ आनंद व्हीलचेयर से बंधे रहने को मजबूर हुए, बल्कि उनके शादी करने की भी सभी संभावनाएं ख़त्म हो गईं. संविधान का अनुच्छेद 21 मौलिक अधिकारों की बात करता है. इसमें शादी कर उसका सुख लेना (मैरिटल ब्लिस) किसी भी व्यक्ति का मौलिक अधिकार है. इस हादसे की वजह से आनंद से वो अधिकार छीन लिया गया. उन्हें जबरन ब्रह्मचर्य का पालन करना पड़ा. ये उनका अपना चुनाव होता तो कोई बात नहीं थी, लेकिन हादसे की वजह से उनका शादी करना और उस शादी को मुकम्मल करना असंभव हो गया.

बचाव पक्ष ने क्या कहा?

चेन्नई कारपोरेशन ने अपनी तरफ से खुद को बेक़सूर दिखाने की बेहद कोशिश की. कहा कि खम्भे की वेल्डिंग का काम बाहर के ठेकेदारों को दिया गया था, इसलिए गलती उनकी नहीं है. उन्होंने आनंद कुमार पर भी इसका ठीकरा फोड़ने की कोशिश की. इन्होंने कहा कि वहां से गुज़रते समय अगर आनंद अपने फोन का इस्तेमाल नहीं कर रहे होते, और सामने ध्यान देते तो इस खम्भे के नीचे दबने से बच जाते. लेकिन मद्रास हाई कोर्ट पर इन दलीलों का कोई असर नहीं पड़ा. उन्होंने स्वतः संज्ञान लेते हुए मुआवजे की राशि को 63 लाख 26 हजार रुपए कर दिया.

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