उत्तर प्रदेश की योगी सरकार छोटी-छोटी बातों पर मुसलमानों के खिलाप देशद्रोह और एनएसए (राष्ट्रीय सुरक्षा कानून) लगा देती है. कोरोना संकट के समय तो स्वास्थ्य कर्मियों और पुलिस पे हमला करने का आरोप लगा कर भारी तादाद में मुसलमानों पर एनएसए लगा कर जेल में डाल दिया गया है, लेकिन जब ऐसी ही घटना में मुसलमान शामिल नहीं होते है तो न तो एनएसए लगता है और न ही मीडिया ने कोरोना योद्धाओं पर हमले का शोर मचाया जाता है.

कानपुर देहात में रसूलाबाद थानाक्षेत्र के तुलसीनगर में रविवार को भीड़ के हमले में एक वरिष्ठ सब इंस्पेक्टर और दो महिला कांस्टेबल सहित सात पुलिसकर्मी गंभीर रूप से जख्मी हो गये.

पुलिस टीम लॉकडाउन का पालन सुनिश्चित करने गयी थी.अपर पुलिस अधीक्षक (कानपुर देहात) अनूप कुमार ने बताया कि लॉकडाउन का पालन कराने गये पुलिस कर्मियों को भीड़ ने डंडों से पीटा.

पुलिस वाले किसी तरह हमलावरों से बचकर वहां से निकल सके. घायल पुलिसकर्मियों को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया गया है.उन्होंने बताया कि लॉकडाउन का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए रसूलाबाद थाने के वरिष्ठ सब इंस्पेक्टर सुखबीर सिंह अपने सहयोगियों के साथ गश्त पर थे. पुलिस ने बिना मास्क लगाये कई लोगों को पकड़ा, जिनमें कुख्यात हिस्ट्रीशीटर सरमन सिंह, तिरान सिंह, बलवान सिंह शामिल थे.

रसूलाबाद थाना प्रभारी तुलसीराम पाण्डेय ने बताया कि सरमन सिंह, तिरान सिंह और बलवान सिंह सहित दो दर्जन लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज किया गया है. पाण्डेय ने बताया कि इस सिलसिले में तीन महिलाओं सहित पांच लोगों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया है.इस तरह की घटना में अगर मुसलमान शामिल होते तो मीडिया आसमान सर पर उठा लेता.

यूपी पुलिस उनके परिजनों के कब्र तक खोद देती, लेकिन यहां ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा है, क्योंकि मारने वाले और मार खाने वाले में कोई भी मुसलमान नहीं है. इसलिए मीडिया खामोश है और पुलिस यूं ही एक मामूली एफआईआर दर्ज कर मामले की ‘जांच पड़ताल’ कर रही है. अगर पुलिस वालों पर मुसलमानो ने हमला किया होता तो सबके खानदानों तक के खिलाफ राष्ट्रद्रोह का केस लाद दिया जाता.

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