अस्सलामु अलैकुम वरहमतुल्लाहि वबराकातुहु,

आज मैं जो मुसलमान हूँ उसका तार मेरे हाई स्कूल से जुड़ा हुआ है। आज जैसा की लोग मुझको देखते हैं, मैं पहले बिलकुल भी ऐसी नही थी। कोई भी अगर मुझसे मिलेगा तो वह मुझको बिलकुल भी नही पहचान पाएगा। और वजह यह है की मैं एकदम से ही बदल गई हूँ। पहले मैं एक नास्तिक हुआ करती थी। मेरा किसी भी धर्म से कोई भी लगाव नही था।

मेरे मुसलमान होने की शुरुआत तबसे हुई जब मैं हाई स्कूल में थी। तब मेरा एक प्रेमी था। हम दोनों एक दुसरे के साथ ही रहते थे। और मैं फिर गर्भवती हो गई। और फिर मैंने बच्चे को जन्म दिया और फिर मैंने उस बच्चे को गोद दे दिया और मैंने इन सब बातों के इलज़ाम ईश्वर पर लगाया। और मैं ईश्वर को इसलिए भी ज़िम्मेदार ठहराती थी की ईश्वर ने मेरी ज़िन्दगी में बहुत ही ऊँच नीच किया था और मैं अपनी ज़िन्दगी में बहुत परेशान हुई थी।

मैं सभी धर्मों को लेकर इतना इसलिए भी जानती थी और खुल कर बोलती थी क्योंकि मैं एक नास्तिक थी और मैं किसी भी धर्म को लेकर पक्षपात नही करती थी। मैं जहाँ काम करती थी वहां के बॉस मुसलमान थे। उन्होंने मेरी बातें सुनी और बोले की तुमहारी सोच बहुत अच्छी है और तुम बहुत ही सुलझे दिमाग की हो। फिर वह दुसरे दिन कुछ कागज़ लेकर आएं और उसमें इस्लाम से जुडी कई बातें थीं। और उन्होंने वह सब मुझको लाकर दिए और कहा की इनको पढ़ लो। तो मैंने उसको पढ़ा और समझने की कोशिश कर रही थी।

मैंने खुद ही हिम्मत किया और इस दुनिया के दुःख से उभरी। वैसे तो मैं एक लूथर परिवार में पैदा हुई थी और मैं उसी परिवार में पली बढ़ी थी। मैंने अपनी ज़िन्दगी में शान्ति लाने के लिए कुछ सोचने लगी और हर तरफ खुशियां ढूंढने की कोशिश करने लगी। मैं जब बच्ची थी तब मैं धर्म को लेकर थोड़ी बहुत इच्छुक थी और मैं अपनी माँ से कहती थी की हम चर्च क्यू नही जाते हैं। और वह मुझसे कहतीं की चर्च में तभी जाया जाता है जब किसी की शादी हो या कोई मर जाए। मैं कहीं न कहीं यह जानती ही की वह मुझसे झूट कहतीं हैं पर मैंने इस बात पर उतना ध्यान नही दिया।

पर अब मैं मैं धर्म के बारे में जानना चाहती थी और मैंने बाइबिल ली और उसको पढ़ना शुरू कर दिया। पर मैंने उसमें कई गलतियां और खामियां पाईं जैसे की बाइबिल पूरी दुनिया में अलग जगहों पर अलग है। मैंने सोचा की ऐसा नही हो सकता है। ईश्वर कभी भी किसी को लेकर भेदभाव नही कर सकता है। तो मेरा धीरे धीरे ईसाई धर्म से मन हट गया और मैं अन्य धर्मों को ढूंढने लगी। मैंने सबसे पहले यहूदी धर्म के बारे में पढ़ा और उसमें भी कुछ ऐसा ही पाया और यह देखा की यहूदी धर्म अपनाने में बहुत मुश्किलें हैं। फिर मैंने इसी तरह बौद्ध धर्म के बारे में भी जानकारियां लेना शुरू कर दी। पर मैं इस धर्म में भी अपने सवाल के जवाब नही पा पाई।

इसी तरह मैंने हर धर्म देख डाले, पर मैंने इस्लाम के बारे में सोचा भी नही था और उसकी वजह यह थी की हम इस्लाम को गलत ही समझते हैं जब की इस्लाम ऐसा बिलकुल भी नही है। और इन सब के बाद मैं हार मान गई। और मैंने सोचा की शायद मैं कभी भी सच को नही जान पाऊँगी।

एक बार मैं एक जगह काम करती थी और वह एक ईसाई लड़की थी और वह बहुत बात करती थी और मैं उसकी बातों पर सिर्फ हाँ हाँ करती रहती थी। पर एक दिन उसने यह बोला की मैं जीसस को बहुत चाहती हूँ। और मैं अपने पति को भी ईसा मसीह (अ. स.) ही समझती हूँ। इसीलिए मैं उनको प्यार करती हूँ।

मैंने उससे पूछा की इसका मतलब क्या है? तो उसने बोला की इसकी वजह यह है की ईसा मसीह (अ. स.) ईश्वर के बेटे हैं। उसने ऐसा बोला तो मैं कहीं न कहीं हैरान हो गई थी। मैं यह तो समझती ही थी की ईसा मसीह (अ. स.) ईश्वर के बेटे नही हैं। मेरा यह सोचना था की अगर ईश्वर है तो उसको एक बेटे की क्या ज़रूरत है अगर ईश्वर को किसी की ज़रूरत है तो वह ईश्वर कैसे हो सकता है। मैं यह सोचती थी की किसी को एक बच्चे की ज़रूरत कब पड़ती है, ज़ाहिर सी बात है एक वंश को आगे बढ़ाने के लिए। मैं सोचती थी की क्या ईश्वर एक दिन मरने वाले हैं जो उनको किसी बच्चे की ज़रूरत है।

मैंने यह पढ़ा था की ईसा मसीह (अ. स.) दुनिया में आम लोगों की तरह चलते थे और आम लोगों की ही तरह खाते-पीते भी थे। तो कैसे ये ईश्वर के बेटे हो सकते हैं। और यह सब बातें जब मुझको पता थी तो मैंने यही सब बातें उस लड़की को बता दी। पर उसको यह अच्छा नही लगा और हम दोनों में थोड़ी बहुत नाराज़गी हो गई।

मैं सभी धर्मों को लेकर इतना इसलिए भी जानती थी और खुल कर बोलती थी क्योंकि मैं एक नास्तिक थी और मैं किसी भी धर्म को लेकर पक्षपात नही करती थी। मैं जहाँ काम करती थी वहां के बॉस मुसलमान थे। उन्होंने मेरी बातें सुनी और बोले की तुमहारी सोच बहुत अच्छी है और तुम बहुत ही सुलझे दिमाग की हो। फिर वह दुसरे दिन कुछ कागज़ लेकर आएं और उसमें इस्लाम से जुडी कई बातें थीं। और उन्होंने वह सब मुझको लाकर दिए और कहा की इनको पढ़ लो। तो मैंने उसको पढ़ा और समझने की कोशिश कर रही थी।

फिर उन्होंने मुझको कुछ दिन बाद क़ुरआन भी लाकर दिया और मुझको पढ़ने को बोला। मैंने उनसे क़ुरआन लिया और फिर मैंने पढ़ना शुरू कर दिया और सबसे पहेल मैंने क़ुरआन की जब शुरुआत की जो की सबसे पहली सुरह है सुरह फातिहा। तो मैंने सुरह फातिहा पढ़ी और मैं बहुत ही ज़्यादा प्रभावित हुई। मैंने जब सुरह फातिहा पढ़ा तो उसमें बहुत सी ऐसी बातें मिली जिनको झुटलाया नही जा सकता और हम चाह कर भी यह नही कह सकते की यह गलत है।

मैंने क़ुरआन में बहुत सी ऐसी भी बातें पाइ जो की बाइबिल में भी थी। पर क़ुरआन में हर बातें तर्क के साथ मौजूद हैं और उस पर कोई ऊँगली नही उठा सकता है।

मैंने क़ुरआन की सिर्फ थोड़ी सी ही आयत पढ़ी थी जो की मुश्किल से आधी पेज भी नही थी और मैं इतना समझ गई थी की मैं सही धर्म को ढून्ढ लिया है। मैंने उस धर्म को ढून्ढ लिया है जिसकी मैं तलाश कर रही थी। पर फिर भी मैं डर रही थी क्योंकि इस्लाम को सब लोग गलत समझते हैं और इस्लाम का नाम आते ही उसको आतंकवाद का धर्म बना देते हैं। मैंने सोचा की सभी यह सोचते हैं तो वह सही ही सोचते होंगे। पर मैंने इस्लाम को और भी अच्छे से जानना शुरू कर दिया।

मैं और पढ़ती गई और जैसे-जैसे मैं इस्लाम को जान रही थी मैं सब समझ रही थी और मैं यह तो पक्का समझ गई थी की जैसा इस्लाम को दिखाया जाता है वैसा इस्लाम बिलकुल भी नही है और यही धर्म है जिसकी मैं तलाश कर रही थी। मैंने अपने बॉस से ज़्यादा मदद नही ली और उसकी वजह यह भी थी की कहीं न कहीं वह इस्लाम धर्म का पक्ष तो ज़रूर लेते। तो इसलिए मैंने खुद ही सब जाना।

मैं जान गई थी की सच तो सच है इस कोई फर्क नही पड़ता की आप उसको कितना भी छिपाएं। आप सच को छिपा ज़रूर सकते हैं पर उसको झुटला नही सकते। और मैं ऐसा ही चाहती थी। और फिर मैं मुसलमान हो गई।

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