29 अक्टूबर राम मंदिर के निर्माण को लेकर एक बड़ी तारीख मानी जा रही थी। गौरतलब है कि न्यायालय ने काफी लंबे समय के पश्चात 29 अक्टूबर को राम मंदिर के मसले पर किसी भी प्रकार की सुनवाई आरंभ करने के आदेश दिए थे। हालांकि आज 29 अक्टूबर को न्यायालय ने एक बार फिर से सुनवाई आरंभ होने के तुरंत पश्चात इसकी अगली तारीख जनवरी 2019 में रख दी। साथ ही यह भी कहा है कि यह कोई भी आस्था अथवा धर्म का विवाद नहीं है। यह मात्र एक जमीनी विवाद है। आपको बता दें किसी के पश्चात मोदी सरकार को लेकर एक बार फिर से लोगों में वाद विवाद का सिलसिला शुरू हो गया है।

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि एक तरफ जहां तमाम हिंदू संगठनों ने न्यायालय के फैसले का विरोध किया है। वही कट्टर मुस्लिम नेता की छवि रखने वाले असादुद्दीन ओवैसी ने भी राम मंदिर को लेकर मोदी सरकार को एक बड़ा चैलेंज दिया है। आपको बता दें कि न्यायालय के फैसले के पश्चात ओवैसी ने सरकार को एक बड़ा चैलेंज देते हुए कहा है कि मैं सरकार को चैलेंज देता हूं कि आप राम मंदिर पर एक अध्यादेश लेकर आएं और राम मंदिर को बनवाएं। इसके आगे उन्होंने कहा कि भारत का आज प्रत्येक नागरिक भाजपा, आरएसएस और सरकार से राम मंदिर को लेकर प्रश्न पूछता है, लेकिन सरकार सदैव इस पर चुप्पी साध लेती है।

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वहीं दूसरी तरफ अयोध्या में एक बार फिर से साधु संतों में कड़ी नाराजगी देखी गई है। आपको बता दें कि अयोध्या में तमाम साधुओं का कहना है कि चुनाव का हवाला देकर न्यायालय के द्वारा मंदिर के फैसले को और अधिक लंबे समय के लिए खींचना सही नहीं है। इसके अलावा एक बार फिर से विश्व हिंदू संगठन ने बयान दिया है कि वह मंदिर निर्माण के लिए अनंत काल तक इंतजार नहीं कर सकते। वहीं एक अन्य साधु ने बयान दिया है कि यदि सरकार 1 माह के अंदर अध्यादेश नहीं लाती है तो वह खुद को आत्मदाह कर देंगे तथा इसका परिणाम मोदी सरकार को 2019 में भुगतना पड़ेगा। हालांकि इसके अलावा उन्होंने यह भी कहा कि न्यायालय इस फैसले को लगातार टाल कर मोदी सरकार को यह संदेश देना चाहती है कि सरकार को अध्यादेश लाना चाहिए

हालांकि क्या न्यायालय के फैसले के उलट मोदी सरकार को कोई अध्यादेश अथवा बिल पास करा कर राम मंदिर का निर्माण करवाना चाहिए। इस बारे में आप हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

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