नई दिल्ली: यूपी में सत्ता की कुर्सी के लिए दूसरे चरण के लिए आज प्रचार थम गया. दूसरे चरण में 11 जिलों की 67 सीटों पर परसों वोट डाले जाएंगे. पहले चरण में 15 जिलों की 73 सीटों पर पिछली बार से ज्यादा, 64 फीसदी वोट पड़ा.

दूसरे चरण में मुस्लिम मतदाता सबसे अहम हैं. इसमें 36 फीसदी मुस्लिम हैं, जबकि पूरे राज्य में 19 फीसदी मुसलमान हैं. खास बात ये है कि काम बोलता है के नारे पर दांव लगा रहे अखिलेश यादव इस बार पश्चिमी उत्तर प्रदेश में धर्म के छोटे-मोटे ठेकेदारों पर ध्यान देने बजाए सबको भविष्य के सपने दिखा रहे हैं.

दूसरी तरफ मायावती को अब तक छोटे मोटे करीब एक दर्जन मुस्लिम धर्मगुरुओं का साथ मिल चुका है. मायावती ने समाजवादी पार्टी के 56 उम्मीदवारों के मुकाबले उत्तर प्रदेश में 99 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया है. इस सब के बीच बीजेपी की उम्मीद इस पर टिकी है कि अखिलेश और मायावती में मुस्लिम वोट बंट जाए और उसे फायदा हो जाए.

मुस्लिमों का वोट बंटने का फायदा किसको होगा

दूसरे चरण में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिन 11 जिलों की 67 सीटों पर वोटिंह हैं उनमें सत्ता की चाभी मुस्लिमों और दलितों के हाथ में होती है. इसमें भी बड़ी भूमिका यहां के 36 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं की है.

एबीपी न्यूज़ ने अमरोहा और मुरादाबाद में पड़ताल की. अमरोहा में एसपी कांग्रेस गठबंधन और बीएसपी दोनों ने ही मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं इसलिए यहां वोटों को बंटवारा होता दिख रहा है. बड़ी बात ये है कि समाजवादी पार्टी का वोटर भी इस बार बहनजी की बीएसपी की तरफ मुड़ता दिख रहा है.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कितने मुस्लिम वोटर?

पश्चिमी यूपी के 11 जिलों में 6 जिले मुस्लिम बहुल जिले हैं. इसमें से रामपुर में 51 फीसदी, मुरादाबाद में 47%, बिजनौर में 43%, सहारनपुर में 42%, अमरोहा में 41% और बरेली में 35 फीसदी मुसलमान हैं. इसी वजह से यहां बीएसपी ने 26, एसपी-कांग्रेस गठबंधन ने 25 और आरएलडी ने 13 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं. 13 सीटे ऐसी हैं जहां एसपी-कांग्रेस और बीएसपी के मुस्लिम उम्मीदवार आमने-सामने हैं. यानी मुस्लिम वोटों की असली लड़ाई उन 13 सीटों पर हैं जहां एसपी-बीएसपी दोनो ने ही मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं.

मुस्लिम वोट किसे मिलेंगे किसी एक पार्टी को या उम्मीदवारों के हिसाब से बंटवारा होगा. ये फैसला आखिरी वक्त तक यहां पर जीत हार के खेल को पलट सकता है लेकिन अगर समाजवादी पार्टी और बीएसपी के बीच मुस्लिम वोटों का बंटवारा होता है तो बीजेपी के लिए राह आसान हो सकती है.

दूसरे चरण में बरेलवी मुसलमानों की पड़ताल

दूसरे चरण में बरेलवी मुस्लिम मतदाताओं की बड़ी भूमिका रहेगी. उत्तर प्रदेश के नक्शे पर 11 जिले जहां 15 फरवरी को वोट डाले जाने हैं. इन 11 जिलों में सहारनपुर में देवबंदियों का जबकि बाकी 10 जिलों में बरेलवी मुसलमान काफी तादाद में हैं. इस इलाके में मुसलमानों में करीब 80 फीसदी बरेलवी मुसलमान हैं.

यहां नेता मुसलमान मतदाताओं का रुख मांपने की जुगत में हैं तो वोटरों की पेरशानी है कि कई सीटों पर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी दोनों के उम्मीदवार मुसलमान हैं. सिर्फ बरेली की बात करें तो यहां कुल 9 सीटे हैं. पूरे जिले में मुस्लिमों की आबादी 35 फीसदी है. कोई भी सीट ऐसी नहीं जहां मुस्लिम मतदाता 50 हजार से कम हों.

बरेली में हज़रत रज़ा खाँ की मज़ार है जो इस विचारधारा को मानने वालों के लिए आस्था का बड़ा केंद्र है. बरेलवी समुदाय सूफी इस्लाम का अनुयायी है. इस बार बरेलवी मुस्लिम पार्टी न देखकर अच्छे उम्मीदवार को वोट देने की अपील कर रहा है.

यहां एसपी और बीएसपी ने बहुतायत में मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया है. ऐसे में मुस्लिमों के वोट बंटने की आशंका है. बरेलवी मुसलमानों के आस्था के सबसे बड़े केंद्र दरगाह आला हजरत के प्रमुख मौलाना मन्नान रज़ा खाँ लोगों से बिहार की तर्ज पर मुस्लिम और हिंदुओं को एकजुट होने के लिए कह रहे है.

आलम ये है कि दरगाह प्रमुख के भतीजे तौकीर रजा ही अलग पार्टी बनाकर इत्तेहाद ए मिल्लत के उम्मीदवारों के लिए वोट मांग रहे हैं. शाही इमाम और अंसार रज़ा के साथ ही आल इंडिया तंजीम अहले सुन्नत और आल इण्डिया इम्माए मसाजिद एसोसिएशन ने भी आल इण्डिया उलेमा एंड मशाईक़ बोर्ड के समर्थन में बीएसपी को वोट देने की अपील मुसलमानों से की है.

इन सबसे अलग लोगों के बीच इन नेताओं की अपील का असर कम ही दिखता है. लोग मानते हैं कि हर पार्टी मुसलमानों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करती है बावजूद इसके लोगों को अखिलेश यादव ही उम्मीद की किरण दिखते हैं.

दूसरे चरण में देवबंदी मुसलमानों की पड़ताल

देवबंद दिल्ली से करीब 150 किलोमीटर दूर है, य़हां दारुल उलूम देवबंद यूनिवर्सिटी है. इस यूनिवर्सिटी से यूं तो इस्लाम के जानकार निकलते हैं लेकिन इन दिनों यहां चुनावी हवा बह रही है. वोटिंग से पहले यहां इस्लाम के जानकारों ने समाजवादी पार्टी को वोट करने की बात कही.

देवबंद से कौन हैं उम्मीदवार?

बीएसपी ने यहां से माजिद अली को टिकट दिया है. समाजवादी पार्टी ने माविया अली को उम्मीदवार बनाया है, वहीं बीजेपी से ब्रजेश मैदान में हैं. देवबंद विधानसभा सीट को कांग्रेस का गढ़ माना जाता है. पिछली बार भी कांग्रेस की माविया अली ने उपचुनाव में समाजवादी पार्टी उम्मीदवार मीना सिंह को हराया था. इस बार माविया अली एसपी के टिकट से मैदान में हैं.

चुनाव में देवबंदी या बरेलवी होने का कोई फ़र्क नहीं पड़ता क्योंकि दोनो ही ओर से राजनीतिक राय जाहिर नहीं की जाती. मोटे तौर पर देवबंदी बहुल इलाका सिर्फ सहारानपुर जिला है, जहां करीब 45 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं बाकी जिलों में बरेलवी मुसलमानों का बोलबाला है. देवबंदी और बरेलवी दोनो ही सुन्नी मुसलमान होते हैं, दोनों के मूल सिद्धांत एक हैं बस तौर तरीके थोड़े अलग हैं.

दूसरे चरण मके ‘वीआईपी’ उम्मीदवार

इस दौर के महत्वपूर्ण उम्मीदवारों में हैं रामपुर से आजम खान, समेत अखिलेश सरकार के तीन कैबिनेट मंत्री, बीजेपी के पूर्व सांसद और क्रिकेटर चेतन चौहान नौगांव सादात से, कांग्रेस के पूर्व सांसद जितिन प्रसाद तिलहर से, मुरादाबाद नगर से बीएसपी के अतीक अहमद जो बाहुबली मुख्तार अंसारी के भाई हैं.

क्या कहता है 2012 का आंकड़ा?

2012 के विधानसभा चुनाव में इन 67 सीटों में सबसे ज्यादा 34 सीटें समाजवादी पार्टी की रही. बहुजन समाज पार्टी 18 सीटें, भारतीय जनता पार्टी की 10 जबकि कांग्रेस 3 और अन्य के खाते में 1 सीट रही.

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